नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के बीच विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देकर राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन के करीब 118 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर पक्षपाती रवैया अपनाते हुए उनकी आवाज को दबा रहे हैं, बहस की अनुमति नहीं दे रहे और सत्तापक्ष के इशारे पर काम कर रहे हैं। प्रस्ताव को लोकसभा सचिवालय के महासचिव उत्पल कुमार सिंह को सौंपा गया है।
प्रस्ताव जमा करने का तरीका और समर्थन
कांग्रेस के चीफ व्हिप कोडिकुन्निल सुरेश, सांसद मोहम्मद जावेद और गौरव गोगोई ने दोपहर करीब 1:14 बजे नियम 94सी के तहत नोटिस जमा किया। सूत्रों के मुताबिक, प्रस्ताव पर 118 से 119 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (एसपी), डीएमके और अन्य विपक्षी दलों के सदस्य शामिल हैं। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा, “यह प्रस्ताव विपक्ष की एकजुटता का प्रतीक है। स्पीकर की पूर्वाग्रहपूर्ण कार्रवाई से संसद की गरिमा प्रभावित हो रही है।”
विपक्ष के आरोप: पक्षपात और आवाज दबाना
विपक्ष का मुख्य आरोप है कि स्पीकर ओम बिरला सत्तापक्ष की ओर झुकाव दिखा रहे हैं। हाल के सत्रों में विपक्षी सांसदों को बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही, जबकि सत्तापक्ष के सदस्यों को लंबा समय मिलता है। विशेष रूप से, पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के अंशों पर चर्चा की अनुमति न देने, चीन सीमा विवाद और अन्य मुद्दों पर बहस रोकने का हवाला दिया गया है। पिछले हफ्ते हुए हंगामे में स्पीकर ने कहा था कि उन्हें ‘कंक्रीट जानकारी’ मिली थी कि कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट को घेरकर ‘अप्रत्याशित कार्रवाई’ कर सकते हैं, जिसके चलते पीएम ने सदन में भाषण रद्द कर दिया। विपक्ष इसे ‘झूठा और निराधार’ बता रहा है।
स्पीकर सरकार के दबाव में झुक गए
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने स्पीकर पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “स्पीकर सरकार के दबाव में झुक गए हैं और हम महिलाओं पर झूठे आरोप लगा रहे हैं। यह पूर्णतः असत्य है। हम शांति और संवैधानिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं, हिंसा में नहीं। पीएम की अनुपस्थिति खतरे की वजह से नहीं, बल्कि विपक्ष के सवालों से डर की वजह से थी।” प्रियंका समेत कांग्रेस की महिला सांसदों (ज्योतिमणि, आर सुधा, वर्षा गायकवाड़ और ज्योत्सना महंत) ने स्पीकर को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि वे सत्तापक्ष के इशारे पर विपक्ष को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम बहादुर महिला प्रतिनिधि हैं, जो धमकियों से नहीं डरेंगी। पारदर्शिता ही सदन की गरिमा बहाल कर सकती है।”
सरकार और स्पीकर की प्रतिक्रिया
iभाजपा ने विपक्ष के कदम को ‘हास्यास्पद’ बताते हुए खारिज किया है। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा, “यह विपक्ष की हताशा है। स्पीकर निष्पक्ष हैं और सदन की मर्यादा बनाए रखने के लिए काम कर रहे हैं।” स्पीकर ओम बिरला ने अभी तक प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उन्होंने विपक्षी नेताओं से मिलकर सत्र सुचारू चलाने की अपील की है। सदन में हंगामे के चलते आज लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दी गई।
स्पीकर हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत स्पीकर को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। नियम 198 के अनुसार, प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं। नोटिस देने के बाद 14 दिनों का ‘कूलिंग पीरियड’ होता है, उसके बाद सदन में चर्चा और मतदान होता है। प्रस्ताव पास होने के लिए साधारण बहुमत (सदन में मौजूद सदस्यों का आधा से ज्यादा) जरूरी है। यदि पास हो जाता है, तो स्पीकर को पद छोड़ना पड़ता है।
इतिहास में ऐसे प्रस्ताव: ज्यादातर असफल
भारत के संसदीय इतिहास में स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दुर्लभ हैं और कोई भी सफल नहीं हुआ है। पहला प्रस्ताव 1963 में स्पीकर हुकम सिंह के खिलाफ आया था, लेकिन वापस ले लिया गया। 1973 में स्पीकर जीएस ढिल्लन, 1989 में बलराम जाखड़, 2002 में जीएमसी बालयोगी और 2018 में सुमित्रा महाजन के खिलाफ भी ऐसे प्रस्ताव आए, लेकिन सभी असफल रहे या चर्चा तक नहीं पहुंचे। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा भाजपा बहुमत (एनडीए के करीब 293 सांसद) के चलते यह प्रस्ताव भी पास होने की संभावना कम है, लेकिन यह विपक्ष की रणनीति का हिस्सा है जो स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है।
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