नैनीताल : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के राजकीय इंटर कॉलेजों में कार्यरत 400 से अधिक प्रवक्ताओं के चयन एवं प्रोन्नत वेतनमान के पुनर्निर्धारण पर अग्रिम आदेश तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में निर्धारित की गई है। यह फैसला न्यायमूर्ति रवींद्र मैथानी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने सुना। याचिका दायर करने वाले प्रवक्ताओं में सुशील तिवारी, धीरेंद्र मिश्रा, विनोद पैन्यूली और शंकर बोरा सहित 400 से अधिक शिक्षक शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य दावा
याचिकाकर्ताओं ने उत्तराखंड सरकारी सेवक वेतन नियमावली (प्रथम संशोधन) 2025 और 18 दिसंबर 2025 को वित्त सचिव द्वारा जारी पुनर्निर्धारण आदेश को चुनौती दी है। उनका कहना है कि:
- 2016 की मूल वेतन नियमावली के अनुसार चयन एवं प्रोन्नत वेतनमान मिलने पर एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट (Granted one increment) देय था।
- सरकार ने प्रथम संशोधन 2025 के जरिए इस इंक्रीमेंट को समाप्त कर दिया और इसे 1 जनवरी 2016 से भूतलक्षी प्रभाव से लागू कर दिया।
- यह संशोधन केवल शैक्षणिक संवर्ग (प्रवक्ता और एलटी ग्रेड शिक्षकों) पर लागू किया गया है, जबकि अन्य राज्य कर्मचारियों को यह लाभ जारी है।
- सरकार भूतलक्षी प्रभाव से पहले से मिल चुका इंक्रीमेंट वापस नहीं ले सकती। यह कदम संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है तथा सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के विरुद्ध है।
सरकार का आदेश क्या था?
18 दिसंबर 2025 को जारी वित्त सचिव के आदेश में निर्देश दिए गए थे कि चयन एवं प्रोन्नत वेतनमान का पुनर्निर्धारण नए संशोधित नियमों के अनुसार किया जाए। इससे हजारों प्रवक्ताओं के वेतन में कमी आ सकती थी, जिसके खिलाफ शिक्षकों ने तुरंत हाईकोर्ट का रुख किया।
कोर्ट का फैसला
सुनवाई के बाद खंडपीठ ने सरकार के 18 दिसंबर 2025 के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि मामले की गहराई से जांच जरूरी है और सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।
यह फैसला उत्तराखंड के राजकीय इंटर कॉलेजों में कार्यरत प्रवक्ताओं के लिए बड़ी राहत है। शिक्षक संगठनों ने इसे अपनी जीत बताया है और कहा है कि यह शिक्षकों के हक की रक्षा करेगा। मामले की अगली सुनवाई में सरकार का जवाब तय करेगा कि क्या संशोधन नियम वैध हैं या नहीं।
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