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चालदा महासू महाराज की हिमाचल यात्रा, इतिहास और धार्मिक महत्व

  • पहाड़ समाचार

हिमाचल प्रदेश, जिसे ‘देवभूमि’ के नाम से जाना जाता है, देवताओं की अनगिनत कथाओं और परंपराओं से भरा पड़ा है। इनमें से एक प्रमुख देवता हैं महासू देवता, जो हिमालयी क्षेत्र में न्याय और रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। महासू देवता चार भाइयों के रूप में पूजे जाते हैं, जिनमें सबसे छोटे और अनोखे हैं चालदा महासू महाराज। चालदा महासू को ‘चलने वाला देवता’ कहा जाता है, क्योंकि वे स्थिर नहीं रहते, बल्कि समय-समय पर यात्राएं करते हैं, गांवों और घाटियों में घूमकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

Chalda Mahasu: The Divine Wanderer Who Redefines Himachal's Faith ...

इतिहास और किंवदंती

महासू देवता की कथा कलियुग के प्रारंभ से जुड़ी है। लोककथाओं के अनुसार, जौनसार-बावर क्षेत्र (उत्तराखंड) में एक ब्राह्मण हुणा भट्ट रहते थे, जिनकी पत्नी कृतिका थी। एक राक्षस किर्मीर ने उनके सात पुत्रों को मार डाला और अब उनकी पत्नी को धमकी दे रहा था। हुणा भट्ट ने भगवान शिव से प्रार्थना की। शिव के निर्देश पर उन्होंने सात रविवारों तक चांदी की हल और सोने की जूती से खेत जोता, जिसमें बैल नहीं जोते गए थे। सातवें रविवार को खेत की मेड़ों से चार भाई प्रकट हुए: सबसे बड़े बोठा महासू, फिर पावसी महासू, वासिक महासू और सबसे छोटे चालदा महासू। उनके साथ उनकी मां देवलाड़ी देवी और दिव्य मंत्री भी आए। इन भाइयों ने सेना के साथ मिलकर किर्मीर राक्षस और उसकी सेना को हराया, जिससे क्षेत्र में शांति स्थापित हुई।

यह कथा महासू देवता को शिव का अवतार मानती है, जो न्याय और रक्षा के लिए धरती पर अवतरित हुए। मंदिरों का इतिहास 9वीं-10वीं शताब्दी का है, जैसे हनोल का महासू देवता मंदिर, जो बोठा महासू को समर्पित है। यह मंदिर उत्तराखंड के देहरादून जिले में टोंस नदी के किनारे स्थित है और काठ-कुनी शैली में बना है। महासू पूजा हिमाचल के सिरमौर और शिमला जिलों में भी फैली हुई है, जो प्राचीन सिरमौर राज्य से जुड़ी है।

चार भाइयों की भूमिका और चालदा महासू की विशेषता

  • बोठा महासू: सबसे बड़े, हनोल क्षेत्र के संरक्षक, जो चल नहीं सकते थे इसलिए स्थिर रहते हैं।
  • वासिक (बाशिक) महासू: बावर क्षेत्र के रक्षक, मुख्य स्थान मैंद्रथ।
  • पावसी (पाबासिक) महासू: पिंगल, मासमोर और कोठीगाड़ के संरक्षक।
  • चालदा महासू: सबसे छोटे, जिन्हें कोई स्थिर भूमि नहीं मिली, बल्कि ‘चालदा राज’ मिला – अर्थात् घूमने-फिरने का अधिकार।

चालदा महासू की अनोखी विशेषता उनकी घुमंतू प्रकृति है। अन्य भाई स्थिर मंदिरों में विराजमान हैं, लेकिन चालदा हर 12 से 40 वर्षों में ‘बरवंश’ नामक यात्रा पर निकलते हैं। यह यात्रा पालकी में होती है, जिसमें वे गांव-गांव घूमते हैं, भक्तों के बीच न्याय बांटते हैं और आशीर्वाद देते हैं। ब्रिटिश काल में (1827) इस यात्रा को बोझिल मानकर प्रतिबंधित करने की कोशिश की गई, लेकिन भक्तों की आस्था पर कोई असर नहीं पड़ा।

हिमाचल यात्रा का इतिहास

चालदा महासू की यात्राएं परंपरागत रूप से उत्तराखंड के जौनसार-बावर, बंगान और देवघार क्षेत्रों में होती रही हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश से उनका गहरा जुड़ाव है। सदियों बाद 2025 में उनकी टोंस नदी पार करके हिमाचल के सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र में प्रवेश एक ऐतिहासिक घटना है। यह यात्रा दसऊं मंदिर (उत्तराखंड) से शुरू होकर पशमी गांव (हिमाचल) तक जाती है, जहां एक नया मंदिर उनका इंतजार कर रहा है।

धार्मिक महत्व

चालदा महासू की यात्रा धार्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे न्याय के देवता हैं, जो झगड़ों का निपटारा करते हैं। ‘लोटा पानी’ की रस्म में झूठ बोलने वाले को दंड मिलता है। उनकी घुमंतू प्रकृति प्रतीक है कि आस्था स्थिर नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ बहती है। यात्राएं समुदायों को एकजुट करती हैं, सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखती हैं और देवता-भक्त के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित करती हैं। उत्सव जैसे जागरा (भादों में) और हनोल मेला में नृत्य, संगीत और दिव्य साक्षात्कार होते हैं। हिमाचल में यह यात्रा नए तीर्थस्थल बनाती है, जैसे पशमी का मंदिर, जो न्याय, सद्भाव और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है।

आध्यात्मिक एकता

2025 में चालदा महासू की हिमाचल यात्रा एक मील का पत्थर है। 8 दिसंबर को दासौ मंदिर से शुरू होकर, 13 दिसंबर को टोंस नदी पार करके और 14 दिसंबर को पशमी पहुंचने वाली यह यात्रा हजारों भक्तों को आकर्षित कर रही है। नया मंदिर बैसाखी (13 अप्रैल 2025) पर प्राण-प्रतिष्ठा के साथ तैयार हुआ है, जहां देवता एक वर्ष रहेंगे। लंगर की व्यवस्था दान से हो रही है। यह घटना उत्तराखंड और हिमाचल के बीच आध्यात्मिक एकता को मजबूत कर रही है। चालदा महासू की यात्रा हमें सिखाती है कि देवता हमारे बीच चलते हैं, हमें न्याय और एकता का पाठ पढ़ाते हैं। यह परंपरा हिमालयी संस्कृति की जीवंतता को दर्शाती है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी।

About प्रदीप रावत 'रवांल्टा'

Has more than 19 years of experience in journalism. Has served in institutions like Amar Ujala, Dainik Jagran. Articles keep getting published in various newspapers and magazines. received the Youth Icon National Award for creative journalism. Apart from this, also received many other honors. continuously working for the preservation and promotion of writing folk language in ranwayi (uttarakhand). Doordarshan News Ekansh has been working as Assistant Editor (Casual) in Dehradun for the last 8 years. also has frequent participation in interviews and poet conferences in Doordarshan's programs.
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