विशेष रिपोर्ट: देहरादून । उत्तराखंड को लंबे समय तक देश के उन गिने-चुने राज्यों में शुमार किया जाता रहा है, जहां की आबोहवा में सांप्रदायिक सौहार्द बेहद मजबूत और अटूट रहा। शांत पहाड़ी संस्कृति, सीमित जनसंख्या, गहरी धार्मिक आस्था और आपसी मेलजोल ने यहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच कभी बड़े टकराव की स्थिति पैदा नहीं होने दी। सामाजिक सद्भाव की मिसाल ऐसी थी कि चार धामों के साथ-साथ रुड़की स्थित पिरान कलियर शरीफ को ‘पांचवें धाम’ के रूप में सम्मान दिया जाने लगा।
लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अचानक तेजी से उभरे घटनाक्रमों ने सरकार, खुफिया एजेंसियों, राजनीतिक दलों और सामाजिक चिंतकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हरिद्वार धर्म संसद से लेकर पुरोला विवाद, हल्द्वानी की बनभूलपुरा हिंसा और हाल ही में देहरादून के बैरागीवाला में हुआ उपद्रव इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि देवभूमि की पारंपरिक सामाजिक संरचना में बदलाव आ रहा है और अब स्थानीय या छोटे विवाद भी बेहद तेजी से सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर रहे हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में आई घटनाएं
उत्तराखंड की शांत वादियों में सामाजिक ध्रुवीकरण की शुरुआत और उसके बाद बढ़े तनाव की कहानी को इन चार प्रमुख घटनाक्रमों के जरिए समझा जा सकता है:
1. हरिद्वार धर्म संसद (दिसंबर 2021)
दिसंबर 2021 में धर्मनगरी हरिद्वार में आयोजित ‘धर्म संसद’ ने उत्तराखंड को अचानक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया था। इस आयोजन में कुछ वक्ताओं द्वारा एक विशेष समुदाय को लेकर दिए गए विवादित बयानों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिसके बाद देशव्यापी बहस छिड़ गई। मानवाधिकार समूहों ने इसे सौहार्द के लिए बड़ा खतरा बताया। हालांकि, इस दौरान कोई प्रत्यक्ष हिंसा नहीं हुई, लेकिन इस घटना ने राज्य में सांप्रदायिक मुद्दों पर सार्वजनिक और राजनीतिक बयानबाजी को पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक बना दिया।
2. पुरोला विवाद (मई 2023)
उत्तरकाशी जिले के पुरोला कस्बे में एक नाबालिग लड़की को कथित रूप से बहला-फुसलाकर ले जाने के मामले ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों का माहौल पूरी तरह बदल दिया। शुरुआत में यह एक सामान्य आपराधिक मामला था, लेकिन स्थानीय संगठनों ने इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़कर बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया।
-
असर: बाजार हफ्तों बंद रहे, बाहरी व्यापारियों (विशेषकर एक समुदाय के लोगों) को क्षेत्र छोड़ने की चेतावनी देने वाले पोस्टर दुकानों पर चस्पा किए गए।
-
प्रशासनिक कदम: हालात बेकाबू होते देख प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी और भारी पुलिस बल की तैनाती कर प्रस्तावित महापंचायत को रोकना पड़ा। इस विवाद की तपिश श्रीनगर, कीर्तिनगर, चौरास और टिहरी तक महसूस की गई, जिससे पहाड़ों में सदियों पुराना आपसी अविश्वास गहरा गया।
3. हल्द्वानी बनभूलपुरा हिंसा (फरवरी 2024)
8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। नगर निगम और प्रशासनिक अमला जब रेलवे/सरकारी भूमि से कथित अवैध मदरसा और नमाज स्थल हटाने पहुंचा, तो स्थानीय आबादी ने उग्र विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते पूरा इलाका युद्ध मैदान में तब्दील हो गया।
-
नुकसान: पुलिस बल पर भारी पथराव हुआ, पेट्रोल बम फेंके गए, पुलिस चौकी समेत दर्जनों सरकारी वाहनों को फूंक दिया गया। इस हिंसा में कई लोगों की जान गई और सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए।
-
कार्रवाई: क्षेत्र में हफ्तों तक कर्फ्यू लगाना पड़ा, इंटरनेट बंद रहा और अर्धसैनिक बलों ने मोर्चा संभाला। उत्तराखंड के इतिहास में यह सबसे भीषण सांप्रदायिक कानून-व्यवस्था का संकट था, जिसमें आज भी कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारियों का दौर जारी है।
4. बैरागीवाला विवाद: सिंचाई के पानी से शुरू हुआ खूनी संघर्ष
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सबसे ताजा और चिंताजनक उदाहरण देहरादून के सहसपुर स्थित बैरागीवाला गांव में देखने को मिला। यहाँ एक खेत में सिंचाई के पानी को लेकर दो पक्षों में शुरू हुआ मामूली विवाद देखते ही देखते दो समुदायों के बीच खूनी संघर्ष में बदल गया। इस हिंसक झड़प में भाजपा कार्यकर्ता विनोद की हत्या कर दी गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद इलाके में मकानों में आगजनी और पुलिस पर पथराव की घटनाएं हुईं। सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों को रोकने के लिए पुलिस को विशेष साइबर मॉनिटरिंग करनी पड़ी और पूरे पछवादून क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
बदलते हालात पर मुख्यमंत्री धामी की दोटूक चेतावनी
इन लगातार होते घटनाक्रमों को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि देवभूमि की जनसांख्यिकी (Demography) को बिगाड़ने और यहां के शांत माहौल में जहर घोलने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीएम धामी ने सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाले उपद्रवियों और कानून हाथ में लेने वाले तत्वों को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और सख्त धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है।
सामाजिक ताने-बाने को बचाने की चुनौती
इन घटनाओं का गहरा विश्लेषण करने वाले समाजशास्त्रियों का मानना है कि उत्तराखंड के दूरदराज के इलाकों में बाहरी आबादी का बढ़ता दखल, स्थानीय युवाओं में रोजगार का अभाव और सोशल मीडिया पर परोसी जा रही नफरत इस ध्रुवीकरण को हवा दे रही है। शासन और पुलिस के स्तर पर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन देवभूमि के इस बदलते मिजाज को थामने और पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अब प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर दोनों समुदायों के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों को मिलकर संवाद की मेज पर आना होगा।
पहाड़ समाचार निष्पक्ष और निर्भीक