गैरसैंण की पहाड़ियों ने एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति का वही पुराना नजारा देखा। नेता पहुंचे, विधानसभा सजी, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हंगामा हुआ, आरोप-प्रत्यारोप चले, अनुपूरक बजट पारित हुआ और फिर सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित! दो दिन का विधानसभा सत्र 11 घंटे भी नहीं चल पाया। अब सवाल यह है कि आखिर गैरसैंण में विधानसभा सत्र बुलाया किसलिए गया था—जनता की समस्याओं पर चर्चा के लिए या महज संसदीय औपचारिकता पूरी करने के लिए?
आंकड़ा बताता है कि पिछले 12 वर्षों में गैरसैंण में 10 विधानसभा सत्रों का आयोजन हुआ और सदन की कुल बैठकें करीब 35 दिन चलीं। जिस गैरसैंण को उत्तराखंड की जनभावनाओं, पहाड़ के स्वाभिमान और स्थायी राजधानी की उम्मीदों से जोड़ा गया, वहां लोकतंत्र की सक्रियता का हिसाब अगर उंगलियों पर गिनना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है।
क्या गैरसैंण अब सिर्फ सियासी पर्यटन का ठिकाना बनकर रह गया है?
जनता ने गैरसैंण को इसलिए नहीं चाहा था कि साल में एक-दो बार नेता पहाड़ पहुंचें, तस्वीरें खिंचवाएं, भाषण दें और फिर देहरादून लौट जाएं। गैरसैंण की मांग के पीछे पहाड़ के लोगों की दशकों पुरानी उम्मीदें थीं—राजधानी पहाड़ में हो, नीतियां पहाड़ के दर्द को समझें और सरकार उन लोगों के करीब पहुंचे, जिनके नाम पर उत्तराखंड राज्य बना।
लेकिन आज सवाल यह है कि गैरसैंण में सरकार की मौजूदगी कितनी देर रहती है और जनता के मुद्दों पर उसकी गंभीरता कितनी देर टिकती है? अगर विधानसभा की कार्यवाही ही कुछ घंटों में सिमट जाए, तो पहाड़ की समस्याओं पर चर्चा आखिर कब होगी?
सत्र छोटा, बजट पास; जनता के सवालों का क्या हुआ?
इस बार के सत्र में सरकार ने ₹7,844.18 करोड़ का अनुपूरक बजट पारित करा लिया। कुल 10 विधेयक भी पारित हुए। सरकारी कामकाज के लिहाज से इसे उपलब्धि बताया जा सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं है कि कितने विधेयक पास हुए और कितने करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी मिली। असली सवाल यह है कि उन फैसलों पर जनता के प्रतिनिधियों को चर्चा का कितना अवसर मिला, सरकार से कितने सवाल पूछे गए और जनता की समस्याओं पर कितनी जवाबदेही तय हुई।
विडंबना देखिए कि सदन में प्रश्नकाल के दौरान एक भी प्रश्न नहीं हो सका। शून्यकाल में भी चर्चा सीमित रही। विपक्ष हंगामा करता रहा, सत्ता पक्ष अपने तर्क देता रहा और अंत में विधानसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी।
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना है और सरकार का काम जवाब देना। लेकिन जब सवाल ही न पूछे जा सकें, जवाबदेही की गुंजाइश ही न बचे और सत्र समाप्त हो जाए, तो फिर जनता पूछेगी ही कि यह विधानसभा सत्र था या बजट पास कराने की एक औपचारिक बैठक?
चुनाव से पहले सरकार की प्राथमिकता क्या है—जनता या चुनावी गणित?
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सरकार ने अनुपूरक बजट पारित करा लिया। सरकार को उम्मीद हो सकती है कि गैरसैंण में सत्र आयोजित करने और विकास योजनाओं की घोषणाओं से जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाएगा। मुख्यमंत्री ने 231.91 करोड़ रुपये की 12 विकास योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी किया।
विकास योजनाएं जरूरी हैं, बजट भी जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र में विकास की घोषणा और जनता की आवाज सुनना एक-दूसरे के विकल्प नहीं हो सकते। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पलायन, किसानों की समस्याएं और पहाड़ में बुनियादी सुविधाओं का संकट ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर विधानसभा में विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।
अगर चुनाव से पहले सरकार का मुख्य लक्ष्य अनुपूरक बजट पारित कराना और सत्र की औपचारिकता पूरी करना दिखाई दे, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार को यह समझना होगा कि केवल गैरसैंण पहुंच जाने से पहाड़ का भरोसा नहीं जीता जा सकता। भरोसा तब बनता है, जब पहाड़ की आवाज सुनी जाए और समस्याओं का समाधान जमीन पर दिखाई दे।
जनता की गाढ़ी कमाई का हिसाब कौन देगा?
विधानसभा सत्र आयोजित करना खर्चीली और जिम्मेदारी भरी प्रक्रिया है। इसमें प्रशासनिक व्यवस्थाएं, सुरक्षा, कर्मचारियों की तैनाती, विधायी तैयारियां और अन्य संसाधन लगते हैं। यह खर्च जनता के पैसे से होता है। इसलिए जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि जिस सत्र पर सार्वजनिक धन खर्च हुआ, उससे उसे हासिल क्या हुआ?
सत्र छोटा होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि पूरा खर्च व्यर्थ गया, लेकिन यदि सदन में जनता के मुद्दों पर सार्थक चर्चा ही न हो, प्रश्नकाल बाधित रहे और कार्यवाही हंगामे के बीच समाप्त हो जाए, तो उसकी उपयोगिता पर सवाल जरूर उठेंगे।
आखिर लोकतंत्र में विधानसभा की अहमियत उसकी इमारत, कुर्सियों, माइक और कैमरों से नहीं, बल्कि वहां होने वाली बहस और जनता के प्रति जवाबदेही से तय होती है।
गैरसैंण की असली परीक्षा अभी बाकी है
गैरसैंण कोई पर्यटन स्थल भर नहीं है, जिसके नाम पर राजनीतिक आयोजन करके जिम्मेदारी पूरी मान ली जाए। यह उत्तराखंड की भावनाओं और पहाड़ के भविष्य से जुड़ा सवाल है। यहां विधानसभा सत्र आयोजित करने का अर्थ तभी सार्थक होगा, जब सदन में पहाड़ की समस्याओं पर गंभीर चर्चा हो, सरकार जवाब दे और फैसलों का असर आम लोगों के जीवन में दिखाई दे।
सवाल सीधा है—अगर जनता के सवाल नहीं उठे, सरकार से जवाब नहीं मांगे गए और जनहित के मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई, तो फिर इस सत्र का हासिल क्या रहा?
गैरसैंण में विधानसभा की बैठकें बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है कि वहां लोकतंत्र की आवाज बुलंद हो। वरना इतिहास में सत्रों की संख्या और दिनों का आंकड़ा तो दर्ज हो जाएगा, लेकिन जनता के मन में यही सवाल रह जाएगा कि जिस राजधानी के सपने में पहाड़ ने अपना पसीना बहाया, वहां उसकी आवाज आखिर कितनी देर सुनी गई?
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