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राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा: क्या 2027 से पहले कांग्रेस को मिलेगी बूस्टर डोज?

  • प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’

उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय बाद कांग्रेस को ऐसा मौका मिला है, जिसे पार्टी केवल एक औपचारिक दौरे के रूप में नहीं बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक शुरुआत के तौर पर देख रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रस्तावित दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब राज्य कांग्रेस लगातार संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता जैसे सवालों से जूझ रही है।

चार जून को अल्मोड़ा में जनसभा, पौड़ी में पूर्व सैनिक सम्मेलन और पांच जून को देहरादून में कांग्रेस नेताओं व संगठन के साथ बैठक—इन तीन कार्यक्रमों को यदि राजनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो यह केवल एक सामान्य दौरा नहीं बल्कि कांग्रेस की “री-लॉन्चिंग एक्सरसाइज” भी माना जा सकता है।

क्यों महत्वपूर्ण है राहुल गांधी का यह दौरा?

उत्तराखंड में कांग्रेस पिछले कई वर्षों से भाजपा के मजबूत चुनावी और संगठनात्मक ढांचे के सामने संघर्ष करती दिखाई दी है। 2022 विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी माहौल की उम्मीदों के बावजूद पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर सकी। इसके बाद कई वरिष्ठ नेताओं की निष्क्रियता, गुटबाजी और संगठनात्मक ढीलापन लगातार चर्चा में रहा।

ऐसे में राहुल गांधी का सीधे मैदान में उतरना कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से बड़ा संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या केवल चुनाव हारना नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना रहा है। राहुल गांधी का दौरा इस मनोबल को फिर से खड़ा करने का प्रयास माना जा रहा है।

अल्मोड़ा से संदेश: पहाड़ की राजनीति पर फोकस

राहुल गांधी की पहली बड़ी जनसभा अल्मोड़ा में प्रस्तावित है। यह केवल भौगोलिक चयन नहीं बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है। कुमाऊं क्षेत्र में कांग्रेस परंपरागत रूप से मजबूत आधार रखने का दावा करती रही है, लेकिन पिछले चुनावों में भाजपा ने यहां भी अपनी पकड़ मजबूत की।

अल्मोड़ा से राहुल गांधी पलायन, बेरोजगारी, सैन्य भर्ती, शिक्षा और स्वास्थ्य संकट, और पहाड़ी जिलों में घटती आबादी जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर सकते हैं।कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि भाजपा के“डबल इंजन”मॉडल के बावजूद पहाड़ के मूल मुद्दे आज भी जस के तस हैं।

पौड़ी का पूर्व सैनिक सम्मेलन: रणनीतिक राजनीति

उत्तराखंड को सैनिक बाहुल्य राज्य माना जाता है। बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक और सैनिक परिवार राज्य की राजनीति को प्रभावित करते हैं। ऐसे में पौड़ी में पूर्व सैनिक सम्मेलन आयोजित करना कांग्रेस की एक बेहद रणनीतिक चाल मानी जा रही है।

  • अग्निपथ योजना।
  • सैन्य भर्ती में बदलाव।
  • युवाओं में रोजगार को लेकर असंतोष।

जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार भाजपा को घेरने की कोशिश करता रहा है। राहुल गांधी पहले भी अग्निवीर योजना को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। कांग्रेस इस सम्मेलन के जरिए सैन्य परिवारों और युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पैठ मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।

देहरादून बैठक का फोकस संगठन

राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम देहरादून में होने वाली संगठनात्मक बैठक मानी जा रही है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी, विधायकों, पूर्व विधायकों और आनुषंगिक संगठनों के साथ राहुल गांधी की बैठक कई संकेत देती है। बैठक में संगठन में जवाबदेही तय हो सकती है। निष्क्रिय नेताओं को संदेश दिया जा सकता है और 2027 की तैयारी का रोडमैप तैयार हो सकता है।

उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी से प्रभावित रही है। वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग शक्ति केंद्र अक्सर पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े करते रहे हैं। ऐसे में राहुल गांधी की मौजूदगी संगठन को एक मंच पर लाने की कोशिश के रूप में भी देखी जा रही है।

कांग्रेस को कैसे मिल सकता है“बूस्टर डोज?

1. कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा

कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यह रही है कि केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को पर्याप्त राजनीतिक महत्व नहीं देता। राहुल गांधी का सीधा दौरा इस धारणा को बदल सकता है।

2. भाजपा के खिलाफ नैरेटिव सेट करने का मौका

कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक, स्वास्थ्य सेवाओं और पर्वतीय क्षेत्रों की बदहाली जैसे मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाने की तैयारी में दिख सकती है।

3. युवा वोट बैंक पर फोकस

राहुल गांधी की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में युवाओं, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय के मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। उत्तराखंड में बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी और बेरोजगार युवा हैं, जिन तक पहुंच बनाने की कोशिश कांग्रेस कर सकती है।

4. 2024 लोकसभा हार के बाद रिकवरी प्रयास

लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की सभी सीटें भाजपा के खाते में गईं। ऐसे में कांग्रेस अब विधानसभा स्तर पर लंबी तैयारी शुरू करना चाहती है। राहुल गांधी का दौरा उसी प्रक्रिया की शुरुआती कड़ी माना जा रहा है।

5. पहाड़ बनाम मैदान की राजनीति

कांग्रेस लंबे समय बाद फिर“पर्वतीय अस्मिता”और “स्थानीय मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश कर सकती है। भाजपा पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि विकास का बड़ा हिस्सा केवल चुनिंदा शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहा।

लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि कांग्रेस के लिए यह दौरा राजनीतिक ऊर्जा ला सकता है, लेकिन केवल भीड़ जुटा लेना चुनावी सफलता की गारंटी नहीं होगा।

कांग्रेस के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं

  • मजबूत संगठन का अभाव।
  • स्पष्ट मुख्यमंत्री चेहरा नहीं होना।
  • आंतरिक गुटबाजी।
  • बूथ स्तर पर कमजोर नेटवर्क।
  • भाजपा की बेहद आक्रामक चुनावी मशीनरी।

भाजपा की नजर भी इस दौरे पर

राजनीतिक तौर पर भाजपा भी राहुल गांधी के दौरे को हल्के में नहीं लेगी। भाजपा कोशिश करेगी कि कांग्रेस की आंतरिक कलह को मुद्दा बनाया जाए। राहुल गांधी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाएं, और केंद्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं को सामने रखकर जवाबी नैरेटिव तैयार किया जाए।

राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की जमीन तलाशने की कोशिश है।

यदि यह दौरा संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं में विश्वास जगाने और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी राजनीतिक आंदोलन में बदलने में सफल होता है, तो यह कांग्रेस के लिए वास्तव में“बूस्टर डोज”साबित हो सकता है।

लेकिन यदि दौरा केवल भाषणों और भीड़ तक सीमित रह गया, तो उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव लाना कांग्रेस के लिए फिर मुश्किल हो जाएगा।

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